ब्रज,याद बहौत मोहै आवे री।
सुवासित रज वह यमुना शीतल,तरु हिर हिर पास बुलावै री।
चंचल खग वो वानर केलि,पौन रह रह जिय तरसावै री।
तपती धूप उर शीतल करती,शीत शीत को अतिही भावै री।
बोल बोलनि अरु नाचत मोरा,कारी बदरा संग पिय लावै री।
वाद्य गान जोरि घर-घर आँगन,प्यारो"प्यारीहु" ब्रज मे बसावै री।
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