गुरु कृपा
गुरू कृपा
गुरू करि कृपा अपार।
अंध लकुटि ज्यौ सहाय,त्यौ गुरू चेरा जान।
तम मिटाय करै उजियारा,मिटाय देवै मिथ्या मान।
मारग प्रेम लली लाल दिखावै,चलिहै कर पकराय।
रखिहै सेवा युगल चरण कौ,तिन दासी ही कराय।
गुरू कहा बचन लकीर सिल को,नाय कबहु मिथ्या मान।
प्यारी इन्ही गुरू चरणा गहिहै,सरबस इन्ही जान।
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