कारे मेघ न आओ
कारे मेघ ना आवौ म्हारे देस।
ज्यो बरसै त्यो तरसै मोरा जिया,तरसै छबी करन पिया पल निमेष।
सावन जेठ सौ विष बुझी बुंदिया,बिनु पिय दैवे मौरे मन को क्लेष।
जा बैरी जा उस देस बरसियौ,जिस देस बसै मौरे रमण हमेस।
अथक जतन करि पिय कै मनावन,"प्यारी" हारी सब अब कछु ना शेष।
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