रँग ए सांवल जबसे

रंग-ऐ-साँवल मय जबसे मेरी आँखे पी रही है
यकीं मानो मेरा तबसे जन्नत-ऐ-जँहा में जी रही है......
समझना ना नहीं आते गम-ऐ-बादल मुझपे तबसे
हुआ कुछ यूं तबसे हर ग़म इश्क-ऐ-मरहम सीं रही है....
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महकता है मेरे अश्कों का हर इक ही रंवा रंवा
तबसै अश्कों की बारीशे जुदा-ऐ-गम को पी रही है.....
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हूं गुमनाम दुनिया मे फरेब-ओ-झूठ की माना
मगर ज़हान-ऐ-मोहब्बत मे कोई तकल्लुफ भी नही है....
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फितूर-ऐ-फिजूल की बातें समझना ना ये "प्यारी"की
यकीं ना हो तो जी देखो नस्ल-ऐ-महोब्बत जो जी रही है.....

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