पुष्पमाल सेवा

पुष्पमाल सेवा
साँझ समयै सखी कुंजन बैठी,बनावती पुष्पमाल।
माल बनाय ऐकौ डोरी,नीचै पंच्च लटकन लटकाई।
पिरोवती एक एक पुष्पे संगै,दुई दुई असुवन धार।
कैसेहु जोरि कृपा करिहै,देवती पुष्पमाल को सेवा।
ललिता सखी सो बिनती किन्ही,जई अर्पण करे भेटा।
नाम न लिन्है सखीन प्यारी को,सेवा हुई उपयुक्त नाही।
लाज को मारि मुख ना दिखावू,कैसेहु कहु मा बनाई।
सैबा बारि बारि ही पाहू,ऐसेहु भाग कदसि जगाई।

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