कदली कुँज लाल लली बिलसै
कदली कुंज लाल लली बिलसै।
जुगल तरू देख अति मोदित,हिय चौप जगै नवी फिरसै।
धारै बसन पात अंग चिकने,पहिरै भूषण गल कुसुम केली।
बनी शैय्या हरै पत्रा की ही,बहु भाँति सौ सजाई सहेली।
छूवै हसै दोउ निरखै परस्पर,छबी आरसी ज्यौ द्वौ दीखै।
पिय प्यारी रंग सरबस "प्यारी",ओर सब रंग रस लागै फीखै।
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