मरण मोर सखी
मरण मोरी सखी
जबसौ पिय सो नैन लडाये,मरण मौरी सखी भयी।
संगै संगै फिरत मौरै,पल छिन मरण होयी।
खावै रहवै सौवै मौ संग,मौरी साँची सखी भयी।
बिरहा अगन जबहि जरिहै,जीवत जीवत मरी।
देह ताप सबहु कौ दीखै,हिय देखै कौन जरी।
एकौ जनम कोटि बार मरिहै,मरिहै घडी घडी।
तापैै जेई मरण लागै,सौ जीवन सो बढिहै बडी।
ऐ री सखी नाय आवै कबहु तू,डरिहै हिय मोरा।
प्यारी बलि बलि ऐसी सखिन पे,जोई पिय जाद चाहवै करा।
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