श्रीगोपाल भट्ट

श्री गोपाल भट्ट प्रगटै गुपाल,रसान्नद वर्षण हेतुई।
अद्भुत छबी त्रिभंग खडी,एकटक लखै भरै नैननी।
श्यामल बरण अति सुघर तन,कौ अधरन नयन शोभा कही।
छबी गौरश्याम एक देहि मे,दीखै लाल कबहुक लाडिली।
भरि आनंद मोदनि सब सखिन,श्रीगुणमंजरी कौ आजु भली बनी।
हर्षित निकुंज कुंज कण प्रति,झूमत सजै द्वार तोरणि।
डफ ढोल बाजत वाद्य विवि,जय-जय श्रीराधारमण सब कही।
राग रागिनी गाए मंगलम,कोऊ कोऊ रिझावै सखी निरतई।
वारि प्राण तन अंतर- करण,सर्वस्व धरि दै न्यौछावरी।
कहा वारै"प्यारी" निज प्राण पै,तन मन हो धन सरबस तुम्ही।
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दोहा--- जुग जुग जीवौ आनंदघन,मानै योई मनौति प्यारी।
 ........ करू सोई जा मै राजी रह्यौ,रहू हित तौ सुखकारी।।

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