उपवन लीला

उपवन लीला

मुदित हिय राधिकै उपवनि आयी।
देखि भरिहि पुष्प गुच्छ डारी,तौरिहै हिय चटपटी बढ्यी।
ऊँचै ढाडौ गुच्छ होहै,उचकि उचकि नाहि कर लौ लई।
पाछे ठाडै मनमोहना छिपिहै,दई डारी नेक सौ झुकायी।
हसति गौरि कर डारी पकरि,त्यौ मोहन छाडि डारी दई।
हाय! दैखिहौ लटकि डार गौरि,छैल छलिया कौ भर पाई।
आवही भुज भरिहि किशौरी,लटकिहि देखि मनचाही पाई।
कहा कहहु ऐसो नित लीला कौ,जिन देखि ताई चरणन बलि जाई।

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