आवै समझ नाय

आवै समुझ नाय जग रीति।
चालू उल्टौ सूधौ चाहै जैसो,जग दोनोई भाँति रहै भीति।
हसू रोवू चाहै धरू मौना,कोउ भाँति इन्हु नाहि सीति।
जग अपनौ नाय तऊही रहवै,"प्यारी" थारी जानै कैसी प्रीति।

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