अनगिन स्वप्न संजोय बैठी
अनगिन स्वपन संजोए बैठी
उसी मार्ग पर मै माधव।
......पगडंडी जिन बीती यादो की
अब भी धूल उडाती है
......संग तेरे चलने की सच बहोत वो
मुझको याद दिलाती है
उसी धूल से मांग सजाए
हू उसी मार्ग पर मै माधव।
.......उन पदचापो की आहट से
ह्रदय झंकृत है अब भी
......मिलन विरह के समय सभी जो
प्रति अंग से श्रृवण की थी
अब उन्ही क्षणो के गीत बनाती
हू उसी मार्ग पर मै माधव।
.......अंग सुवास तेरी चंचल सी
यँहा अभी अरे अभी कहाँ
........मै लुक-छुप क्रीडा प्रवीण तुम्हारे
कौशल की जीवंत कथा
पुन: आज भी उसी आस मे
हू उसी मार्ग पर मै माधव।
....... हम समीप बहोत पर दूर बहोत
विरोध परस्पर के ये भाव
.…...अब सब जीवन कदाचित हेतू है
तेरी जीवित मुझे रखने की चाह
सत्य,भ्रम जो हो सहेजे
हू उसी मार्ग पर मै माधव।
........है बस वचन तेरा विश्वास मेरा
यथाशीघ्र मै "प्यारी" आऊंगा
.......आनंद मिलन के वर्धन को
किंतु प्रतिक्षा लौटा लाउंगा
शब्दार्थ समझ भी सब तेरे
रहू उसी मार्ग पर मै माधव।
.......रहू उसी मार्ग पर मै माधव।
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