कहा कहु सखी

कहा करू सखी?
पुकारू .......के नाय?
मेरौ पुकार वाकू दुख: देवे का री? कौन सो पूछू।
कौउ सौ बतियावै को जी नाय।
बतियाय तै होय ही कहा।उल्टो मौरा.....न न ....वा कौ हिरदै ही मोय सीख सिखाय।हाँ री मेरौ रह्यौ ही कहा तबतै जबतै.....
हाँ तो,सीख सिखाय रह्यौ हिरदै,कछु दिना तै बड्यौ ज्ञानी बने रह्यौ।
मोय कहे है नैन मूंद नेक ध्यान कर,ना री, मौते तो नाय होय।
नेक नैन मूंदवे तेई लगै नैनो ते बाहर आय घौम रह्यौ,देखवै कू नैन खोलू तौ नाय दीखै।
तडफ के रह जावू हू री....नाय भीतर नाय बाहर।
प्यारौ कित्त गयौ....
रोय हु न सकू..... नैनन मै पानी जो नाय,भला बिन पानी कोय रोय सके का सखी।
कह तो सखी,का मोय तज गए पिय,कहा मै भुला दई उनकू।
जी कदि कहै वौ राजी मोय तज तऊ च्यौ रोवू,अर नेक सौ ही देर मे कहै ... ना ,पुकरू .... अरी मौसो रह्यौ ही ना जावै री वाकू सोचवै बिनु।
कदि तौ मोय लगै मौपे एक भी जी ना है अरू कदि कदि लगै है मोपै कई सारै जी है री।सब अपनी अपनी कहै......
मै बस रोय कै रह जावू .....

जई वौ नाय बतियावै कू ताई कोउ सौ न कछु कहु सुनू.....
तू कह न सखी
कब आवेगै वे
वै आवेगै तो न.....
हाँ भला च्यो न आवेगै
आवेगै न
हाँ न
कह
तू कह न
यूँ मौन न धरा कर
बोल न

बोल री
कह दे
आवेगै
वै आवेगै
वे आवेगै री
आवेगै

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