नाचत लली लाल

नाचत लली लाल
नाचत लली लाल कुंज उपवन।
थिरक ता थई बोलत डोलत,अंग मटकन कर चलावत।
झूकत कमानी सौ कटीली कटि,लली नैन तीरछे सैन चलावत।
उडत पीत पटाहु मोहन,नील तारा चुनरी श्यामा फहरावत।
वेणी नगिनी डोलत कटिहि,मंद हँसत पदहु गिरत उठावत।
नाचत भूषण सबै अंग अंगै,पायल पद नाचत इतरावत।
मुख अगै कर रखिहै ऐकौ,ऐकौ कर शिर उपरि जावत।
मोडत अंगुरि बनत भली मुद्रा,नैन संगै अंग अंग मटकावत।
निरत ऐसौ रस रास लीला पै,प्यारी हौहि बलिहु जावत।

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