काहै रमणा सुनत ना मौरी।

काहै रमणा सुनत ना मौरी।
निठुर ही जई बननौ थौ प्यारौ,किन्ही मन की काहै चोरी।
छाडिनी थी कर जग ज्यौ ऐसौ,काहै बाँधी निज संग डोरी।
कर खोखर मोहे भाँति निज बंशी,राखी अधरन सौ च्यौ दूरी।
पहुचै ना वाणी या बनौ अनजानै,कछु दीजौ बताय मन तौरि।
सुनो बिनती मिलो आन रमण जु,थारी जोहै बाट "प्यारी" चेरी।

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