सजावत गलियन
सजावत गलियन
सजावत गलियन आवेगे मुरारी।
पलकन झार बुहार लगावू,हिय सिंहासन मलूक सजानी।
साज श्रंगार अनूप धरावू,पिय हित अबही सज जानी।
कुसुम सौ नील कमल कौ लावू,मोतिन को माल नीकौ पुरानि।
अंगना गलियन चौक सजावू,रंग सौ प्रीत को सबही सजानी।
करहु पकरि पिय बैठावू,आपहु पायन नीचौ बिठानी।
कोमल अंचल सौ पगा पलोटू,नैनन जल सौ पायन धुलानी।
जानत हौ आवेगौ प्यारी कौ गिरधर,देर भई नाहि आवन टलानी
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