रबि उगत
रबि उगत
रबि उगत पूरब दिशिही,दुई परछाही बिटप तले बैठी।
लाल जमुना जल डूबै रबि,मिलत रही नेक हिरत न ऐठी।
छाती टिकाये सिर नैन मूंदै,प्यारी पिय सबै बिसराई पैठी।
मुखै शीतल शांत दुईन कौ,रोम रोम कूपै प्रीत बहती।
भेद दीखै नाही दोउन मे कौउ,छबि दुई एकहु हौहि बैठी।
उठत ज्यौ ज्यौ भानु जलै उपर,सुंदर दरश जौरि सौ पाती।
दीखत गौर श्याम होहि अंतर,लिपटि दैखि जौरि संग राती।
जै जै करत सखिन दासी,प्यारी जौरि जय जय मनाती।
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