मन गेरुवा

मन गेरूआ
मन रंग दीन्हा गेरूआ।
जगत नाहि समुझे रंग हिय को,शीश नवावै रंगा तन।
मना रंगा मै बैठू सन्तन संग,डौलू जो घौमती बन।
कहै मोय जग झूठौ ढौंगी,काहै रंगायौ नाय तन।
साँचौ जानै उही जानै,तन चढायौ गैरूआ रंग।
हिय होय बेरंग इनकौई,करे राग बेैराग किजै भंग।
प्यारी दैखिहै का ऐसौ संता,पल पल रहवै दंग।

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