एक विनती
एक विनती....
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हे ब्रजचन्दन रमणा प्यारै!लिजौ मोहि अपनाय।
गुण अवगुण मौरे तूल ना दैवो,जैसी चहौ वैसी लिजौ बनाय।
ह्यौ काठई पुतरी थाम डोर तुम्हीं,निज मन भाति रहियो नचाय।
कर लकुटी पखा बांस की पौरी,राखौ माल रज नुपुर बसाय।
नैन छुपत फिरौ इत्त उत्त क्योई,बसौ ठौर उर नैननि आय।
जेई मानौ अरजी दीन सखी निजकी,मानौ करि नैन नीर बहाय।
नाथ अनाथ भई तौहरे होय कैसे,"प्यारी"उर भ्रम दीजौ मिटाय।
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