पगा मन
पगा मन
दीन हौहि काहै नाहि रहतौ रै पगा मन।
काहै उडि उडि फिरिहै जगत कौ,काहै न ध्यावै जै जै चरणा जोरि।
काहै मतिहीन होत बौराय जग डोलतौ,काहै पिय प्यारी नाहि हिय बैठारि।
पाषाण सम हिय काहै कियै तैने राखैहै,काहै न जुगल करूणा देखि नैन बहरि।
यासौै झूठौ नेह करि जग सौ लगायौ काहै,काहै कौ तैने पिय प्यारी कौ भकायोरि।
जबहु तौ रोवैगौ जगत दुत्कारैगौ,अबहु नाहि जुगल प्रीत मौल जानैरि।
छाडि झूठै साँचे नेहा ओरन सौ,टहल टकोरि हित नैनहु बहायोरि।
कर जोरि कर बिनती प्रेम जौरि सौ,कुंजन टहल कौउ दासीहु कौ पायौरि।
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