युगल रस
युगल रस
रस घन दामिनी दुई बिलसै।
नील बसन पहिरै घन सुंदर,दामिनी उठि चमकै।
मोति लुटावत भर भर घनहि,रहि दामिनी जाय झनके।
कबहु चिबुक कबहु कपोल पलौटै,युगल दोउ बिलसै।
अधर कलिका सम पुष्प अधर धर,रस प्रेम भरै हुलसै।
झाकत चन्द्र तरू सौ तम ही,जुगल जोरी निरखै।
छकत थकत कछु सजग होहिहै,पीबत नाही अघिहै।
जिन नैनन इन्ही दरस पाहिहै,प्यारी चरणन ताहि गहिहै।
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