सावन

सावन
जरे पै नौन लगावै सावन।
पहलैहि बिरहा मारी,ता पै आय गयौ सावन बैरी।
अंग अंग जरिहै पीयु बिन,अरू बोलै पपीहा बौली कटारी।
जा कै पिय संग वा ही, सखी सहेली सुहागिन होयी।
दूरि देस बस्यौ साँवरौ मैरौ,हाय करि अभागन दयी।
चंदा ओ पिय देखत तौ कू,सुनाइयौ जाय एकौ हमरी बात।
बिरहन छान लयी सबै कुंजन,कुसुम डाल डाल अरू पात।
बीत्यै सावन ता सौ पहिलै आवौ,पहलौ बरखा रूकन सौ आवौ।
गिरधारी प्यारी दासी तिहारी,बाँह छुडायौ काय जावौ।

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