देहि को रूप
देहि को रूप
कौन काज आना देहि कौ रूप।
जीवतौ रोग बिरोग दाहिए काज अहिहै माई नाही पूत।
कछु झूठै चित्त चिंतन खाहिहै लूटिहै भरि भरि मूठ।
मरि पाछे कहो कौन जानिहै कीट खावै बिगारौ रूप।
अग्नि जलिहै दाह होहिहै भए रूप सजीलौ कुरूप।
अरू कहिए नेक कहा कोउ होहि नंद कुँवर सो अति अनूप।
रै प्यारी झूठै रूप छाडी ध्या राधारमणा प्यारौ मलूक।
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