हे वृदारण्य तव धन्य धन्य

हे वृंदारण्य तव धन धन्य।
जिन दरश करन मुनि देव सब तरसत,तै विहरै सहज अंकनि या अरण्य।
उर शारदा लोभ जिन बसत पग नुपुर,इन भूषण शबद परिहास कुंज गूंज्य।
सुख केलि हित नित सजग दोऊ प्यारौ,बहु भाँति लडैति जोरि लाड़ लडन्य।
अहो "प्यारी" उर ऐसौ तव कीजौ वृंदावन,हो पिय-प्यारी सुख छाडी सबहु नगन्य।
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(पद की पहली पंक्ति में "धन" शब्द के दो अर्थ भाग्य एवं वृंदावन के धन अर्थात युगल सरकार से है)
अत: अर्थ है--------- हे वृंदावन तुम्हारे भाग्य एवं तुम्हारे धन युगल दोनों ही धन्य धन्य है।
धन्य धन्य है.......

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