कैसी भँवर रमण नैया अटकी

कैसी भँवर रमण नैया अटकी।
दिन बीतै ज्यो जावै ओरि डूबत,फिरै मन-कौ नाव जगहु भटकी।
मौर मल्हा गयौ बीच नदी छाडै,गयौ बीच अधर छाडिकै लटकी।
सुनि जासौ मिलै पुनि नाय लौटाए,चालौ मोर बेर काहै रीत हटकी।
उबारो तुम्ही आ "प्यारी" उबारौ,मौरे रमण छुडावौ साँसन घट-की।

Comments

Popular posts from this blog

हरि आए संग

कहा प्राणन

तुव बिन पिया