पथ कुमुद कौ बनौ मनोह

पथ कुमुद कौ बनौ मनोहर,देखि सखी कुंजन जल ऊपर।
दौऊ पंक्ति ऐसी बनी आली,एक पै लाल चलै एक पै लाली।
भुज आपस थामै इत्त आनै,इक-इक पग धरै चलै सयानै।
धरिकै पग इक दैखे आनन,पुनि पग धरै पुनि रहै मुस्कावन।
पैडि निकट चलै योई आए,लिपटै भवन रंग भीतर जाए।
बहुतई भाँति करै रस रासा," प्यारी" करि इन दरस प्रकाशा।

दोहा------ रस प्रेम अथाह लली लाल कौ,ऐसौ कहा ना जाय।
"प्यारी"| जिव्हा जनम अनंत मिलै,तऊ अणु कहवै ना आय।

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