जई चलत बिहारिन
जई चलत बिहारिन छाडत सैजा,भुज पकरि रोक लई पुनिही बिहारी।
धरा पग धरा इक एकहु सैजा,करी मुरिकै लली फिर ओरि निहारी।
नैनन नैन मनुहार करत पिय,मुख-कृति करि योई ज्यो हौ बिचारी।
आलिन देखि लली अतिही लजाई,पिय दीन्ही पटा संग लाज बिसारी।
लए चुटकी बैठाई नीकौ सखीही,"प्यारी" हसि देखि पूछै प्यार निशानी।
Comments
Post a Comment