गोपी प्रेम

गोपी प्रेम
गोपी प्रेम पावन अति जानो।
दीये सरबस न्योछार पिय चरणा,मुक्ति भुक्ति दये डार।
पिय सुखै सुखि है रहिए,दयौ पिय सुख परम अपार।
स्व देहि को सेइए ताई,पिय देहि सुख देत रहार।
अनचाहे रूप संवारिए ताकै,सबै होत पिय एकाकार।
बिरह ताप हिय धारिए,या सौ होत प्रिय सुखार।
कहत गोविन्द प्यारी जानिहै,प्रेम पात्र ना गोपि सौ हमार।

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