ए हे चपलांगी बूझो पहेली
ऐ हे!चपलांगिनी बूझौ पहेली।
तव दृगन चपलता पाई नभ चपला,याए तुव शिक्छा सोई ते लैली।
भंड्ग कटाक्ष तौ भई द्युति चंचल,कहा चपला तुव होइहै सहेली।
सोच बिचार गहन करि जाना मै,नैन गुरू तौरे पाए चपला चेली।
ऐही सहजई जीते मम उर चंञ्चल,जीतै वेगित अति पौन खेल खेली।
हास परिहास पिय प्यारी मनभावन,"प्यारी" दीजौ दरशन ऐसौ अलबेली।
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