मोहे रूप रमण कौ सुहाए

मोहै रुप रमण कौ सुहाय।
री मोहै,‌रूप रमण कौ सुहाय।
सब कुसुमन रंग रूप बिसारिकै,ह्यौ तौ घन रंग रमणहु भाय।
छटा जगत लखि लाख तै ऊपर,मौ कौ इन छटा एक छकाय।
नैनन फसि इन हसै उर मौरा,देखि दरपन डरि-डरि जाय।
सुनौ बिनती "प्यारी" हटिहौ ना नैनन,रमणा ऐसौ कोउ करि दो उपाय।।।

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