जब अंतिम बार प्यारी सखी अपने रमण जु से मिली तब उनके लिए एक पाती ले गई।गुसाई जी ने पाती लेकर उसे रमण जु के चरणो से लगाया फिर उसे खोला उन्हे पढ कर सुनाया और फिर उनके बिलकुल निकट दाई ओर रख दिया,तब उस पाती के लिए प्यारी सखी के हृदय मे ये भाव उमडै....
सखी हे! बडभागिनी पाती।
चरण लगी मौरे रमण लाल कै,लगी हे! चरणन इतराती।
जड सम्मुख याकै अज होई मै,बनि हे! चेतन जे पाती।
अद्भुत बात मै मूक जे बोलै,कहि दे! मन की सब बाती।
माना कहै मौरि तऊ लगै सौतन,हाय जे! जरावै ह्यौ छाती।
रमण सौ तूइ कह अरजी जे,"प्यारी"तै! मिलवै तौ भाँति।
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