पीर ढाँपूं

पीर ढाँपू

हिय पीर ढाँपू उघरै।
बैठौ कबहु इकली कुंजै,कबहु भरी भीर निकरै।
ज्यौ ज्यौ ढकू उघरत जावै,दीन मौय कर दैय।
असुवन बाढि कबहु लई आवै,कबहु मौन सब लैय।
हा हा करत काटै करैजौ,कबहु पिय प्रीत रसै।
इकली ही कबहु प्यारी रौवै,कबहु आपु ही हसै।

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