लगी उर लाल लली छवि

लगी उर लाल लली छब मनहर।
सरस वपु रसभरै नैन मदमातै,सरस रंग सेज परै भुज कसकर।
अधर हासी कुसुमनि दल-द्वौ लजातै,कपोल लाली गई सींवा परै बढकर।
जडता रस अंगनि परी अति-भारी, शिथिल बेसुध परै अंग सब थककर।
दरस अति अनुपम जुगल किशोर-कै,"प्यारी" ज्योई पाए चाहै ओरि बढकर।

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