चपल चित्त
चपल चित्त
चपल चित्त कहाँ फिरत अधमन।
काय बिषय बासना भटकत,काय पुकारियै नाय नाम।
ध्यावै काय जग झंझट झूठै,गावै नाय जुगल सुखधाम।
पुण्य प्रताप समुझत झूठै,गावै आपु आप कौ गान।
भटकत जग जंजाल जंजीरे,तबहु करत नाय पल छिन भान।
गहै न जबै चित्त श्याम चरण,भलै हित हेत लगावै कौन।
जुगल अगै सब छाडिहै,जानिहै जगत कौ बौन।
प्रेम को पंथ रे चालिहै,छाडि जगत को नेह।
सद्गुरू करहि थामै कै,प्यारी पावै प्यारौ देह।
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