लज्जा
लज्जा
मौ सम अधम कुमति दीखै कोउ न।
कुटिल अधम गुणहीन मति मारौ हूँ,हूँ ही खल कामी रस लोलुप बाँवरौ।
सप्त सिंधु नवद्विप जग ढूंढै हू,देखिहौ न कोऊ लोभी दुष्ट मौ सौ साँवरौ।
फिरत ह्रदय धरै काम लोभ क्रोध ही,मोह तजी नाय जोरी झौरै काय जावरौ।
हा हा खावू कौन मुख सो पुकारू हौ,कारौ मुख वारौ नाय दिखावन काम रौ।
कौन विधि प्यारौ मलिनता मैटिहै,प्यारी कौउ विधि चरणा सौ लगाय रौ।
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