सद्गुरु कृपा

सद्गुरू कृपा
सद्गुरू कृपा अनंत।
चेला ही साध पुजाहिहै,गुरू संग ही सधवाय।
कृपा करे चतुर बारि हौ,आय जानिहै कृपा जनाय।
पहिलै कृपा होय जाद सौ,ज्यौ कछुवी अंड पकाय।
धरै राखे रेती भीतर हौ,आप जल भतर स्मराय।
जावै कितनोई दूरी अंड,जाद हु सौ पक जाय।
दूजै दृृष्टि कृपा भयी,ज्यौ मछरी सहेजे अंडाय।
नेक नेक देरि सो देखती,त्यौ चेला गुरू दृष्टि पक जाय।
तीजै कुररी सम कृपा,शब्द दिक्षा कहाय।
अंड भूमि ही पडिहै,आप नभ उडि शबद कराय।
शबद सौ ही अंड पकिहै,त्यौ चेरा पकि जाय।
चतुर्थ होय स्पर्श दिक्षा,मयूरी सम ह्यै जाय।
बैठि अंड पकाहिहै,त्यौ शबद सौ चेरा पकि जाय।
करिहै कृपा सद्गुरू मो पै,प्यारी बैठी शीश झुकाय।

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