म्हाने हरि हेत
म्हानै हरि हेत लागी।
जी....म्हानै हरि हेत लागी।
पाणी ऊपर दीवलौ ज्यू सु थारी म्हारी प्रीति,नैनन जल घिवडौ बन्यौ ,बन्यौ मनहु मौरा बाती।
जिवतौ जरा मनवा मरा हु हौवत ना हाती,संगै साथी छूटै मौते तो,एक लागी तुमतौ लागी।
हासी हसू थारी रोवू नु देखि जग बाणि,थारी भई तो भई साँवरौ,मै तो याए मे राजी।
आँगन छाँवल पीपलौ ज्यू त्यु म्हारी जी जाति,निज उगै लौगन डरै,दूजै पूजन हु को जाती।
हरि तकि हरी भई हु ज्यु सावन पाती,"प्यारी" थारी थौ प्यारीके जी,जग हौवे ना हौवे राजी।
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