नाहि कुंजन मे ऋतु ठौर।
कहि ना सकै कब फागुन सावन,लगि जावै कब अमुआ बौर। 
अवधी ना कोई नाय कोई सींवा,रहै कब लौ कौन को जोर।
मन भावित उपजै सोई सम्मुख,चलै भाँति हिय गति द्वौ किशोर।
"प्यारी" विनत कर विनति योई,करै सुख सेवा योई निशि भौर।

Comments

Popular posts from this blog

हरि आए संग

कहा प्राणन

तुव बिन पिया