अविगेयम प्रार्थनापि
अविज्ञेयं प्रार्थनापि च स्मरणम्।
प्रशंशस्ति गुणौपमादि कथ:देयम्।
निराकार साकार ब्रह्म: न ज्ञातम्।
जानामि त्वं च त्वं गुण रूपम्।।२।।
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प्रार्थना किस प्रकार से की जाती है और किस प्रकार से आपका ध्यान स्मरण किया जाता है इन से मै पूरी तरह अज्ञात हूँ अनभिज्ञ हूंँ।
कैसे,किस प्रकार से आपकी प्रशंसा की जाए आपके जो रूप गुण आदि है उन्है किस प्रकार और क्या उपमा दी जाये इन सब के विषय मे मुझे कुछ भी तो नही पता।
बिना शरीर वाले अथवा शरीर वाले जो ब्रह्मा है विधाता है उनके विषय मे भी मै कुछ अधिक नही जानती हूँ।
मेरे प्यारे जु ,मै आपकी प्यारी तो केवल और केवल आपको और आपके गुण (आपके नयन, आपकी मुस्कान ,आपके श्रृंगार) आपके रूप को ही जानती हूँ मेरे तो सर्व सर्वस्व आप ही है।
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