मम शीतल पौन

मम शीतल पौन जरावत जिय री।
अर्ध निशि पिय बिनु विषधर सम,डसिकै बिष अंग फैराय दिय री।
चंद्र किरण तीखै बुझै शर सम, छाती चीरत उरहु समाय गय री।
सरबस जग भूमि मरूही लागत,तजि जिवती प्यारी हु जराय गय री।

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