छुपा लो मोहै राधारमण नैनन।
जग सौ चुराकै पलक ढाँप लौ,भावै ना हमे अब जग मे रहनन।
भरि निज नैनन भीतर समा लौ,समा लौ भाँति स्वास प्राण जैसन।
रहवै निशान ना जग नाम मेरौ,पुकारै मोहे नाम सौ तेरौ सब जन।
बिनती जे अंतिम"प्यारी" दासी मानौ,बाद याकै बच्यौ ना कछु कहनन।

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