सांझ सेवा
साँझ सैवा
साँझ हती जौरि संध्या सैबा करन सखीहि जुटी।
बैठत रही कुंजन माही टहल आपनौ आपनौ करी।
सखी देखत राह जुगल कौ दई थाल सजात रही।
पूछिहै सखी कहवौ तौ आवू देखत काहे दैरि भयी।
पावत सम्मति पकर करहु चलत निहारन सखीन दुयी।
निकुंज माही झाकत झाकत जुगल छबि देखत रही।
आवत श्यामसुन्दर प्यारौ हसत पूछत सखी का भयी।
सकपकायी काहै री सखी कहा तौरि पकरि चौरी गयी।
कहत हसिहै श्यामा जौरि पूछत पकरि चिबुक रही।
बलि बलि हौ ऐसौ प्रेम सिंधुहि डूबत डूबत नाही अघी।
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