कागा ओ कागा

कागा ओ कागा कदि म्हारै घर आय।
काह-काह कह कर म्हारी अटारी,आवन संदेशों पिय कबहु तो लाय।
उजडौ प्रेम तरू मन जून सूनौ,सूखी शाख हिय बैठा नाम उन गाय।
जड चेतन करी सबतै विनय ह्यौ,दीन्ही भेद प्रीति जड़ चेतन मिटाय।
"प्यारी" आस करै कोई काहै कासौ,रमण सिवा दूजाहु दैवे ना दिखाय।

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