देव श्रुति स्तुति

देव श्रुति स्तुति त्वं वचनम्।
भोजनं व्रत: तुभ्यं दर्शनम्।
परमानदं च कथा श्रृवणम्।
जानामि त्वं च त्वं गुण रूपम्।।७।।
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आपके द्वारा कही गयी बाते ही मेरे लिए देवो द्वारा रचित स्तुति,वेदो मे रचित श्रुति आदि है।इन्ही से मै आपकी स्तुति कर लेती हू,आपके वचनो को दोहराकर आपकी ही स्तुति।
मेरा भोजन अथवा मेरा उपवास आपके दर्शन ही तो है,आपको देखकर मै तृप्त अनुभव करती हूँ।
आपकी कथाए सुनना,आपके बारे मे ही सुनते रहना मेरे लिए परम आनंद है प्यारे जु।
क्योकी मेरे प्यारे जु मै आपकी प्यारी तो केवल और केवल आपको और आपके गुण(आपके नयन,आपकी मुस्कान,आपके श्रृंगार) आपके रूप को ही जानती हूँ,मेरे तो सर्व‌ सर्वस्व आप ही है।

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