बिछोह बौरी

बिछोहै बोरी

बिछोहे बोरी भई सगरी।
जबसौ पिय मथुरा सिधारै,भूली जमुना जल लान गगरी।
कोऊ पिय बैठी मान विटप ही,देखी कोऊ बात बनावत री।
कबहु उलाहनौ देवती मोहन,कबहु आप दोष निकारत री।
धुनि कोई रमात ही देखी,मोहन हिय भुलावत री।
मैय्या की कहे कोन हिय सो,लई माखन ढूंढे सखी सारी री।
सबन ते न्यारी राधिके देखी,बैठी कुंजन हिय मारी री।
खग मृग गैय्या सबहि व्याकुल,प्यारी व्याकुल सबन संग भारी री।

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