हो वक्त का तकाजा
हो वक्त का तकाजा,या के विधि का लेख हो....
हो दूरियां ना दरम्यां,हो ना हो चाहे एक हो
।
संगीत प्रणय चाहे न हो,ना हो मगर गुस्ताखियां....
ये इल्तजा हो विरह ही,मध्य मगर ना शून्येक हो
।
अंतर चाहे जल-म्गन हो,चाहे विरह की अग्न हो.....
ओर कुछ ना हो भीतर बाहर,पर अस्तित्व तुम्हारा एक हो
।
उस एकत्व की हो सत्यता,"प्यारी" तुम्हारे जो मध्य था......
वादा-खिलाफी मुमकिन नही,बस अटल सदा वह रेख हो।
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