अनूप रूप बस्यो दृगन में
अनूप रूप बस्यौ दृगन मै गाढै।
श्याम लता द्वौ रसीले फल लटकै,नयन लटकि रहै रस टपकातै।
दल द्वौ गुलाबनि सरस रस चमकै,अधर सजि रहै दोउ मुस्कातै।
कटिली कटि भाँति बेल ज्यौ लचीली,ठाडै नितम्ब एक ओरि कौ काढै।
पद द्वौ सुकोमल सहज अति सौहणे,नुपुर बजै जई चलै बलखातै।
बसियौ सहज यौ सहज "प्यारी" दैखे,दैखे नयन खुले बंद सब भाँतै।
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