मेरौ मन पतझर ऋतु छाई

मेरौ मन पतझर ॠतु छाई।
जग फागुन आयौ मनभावन,मौपे छाए ऋतु एक सदाई।
जाकै पिय परदेस सिधारै,वाकौ दैवे सब अगन लगाई।
पल-कौ नाही जुग-कौ बिरहा-जे,नाय दैवे अब मोय सुहाई।
जनम अबिकेहु योई जावैका,"प्यारी" दीजौ नेक रमण बताई।

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