दीजौ जी रमण
अजी,दीजौ जी रमण मन म्हारौ लौटाय।
आवौ ना लै जावौ रीत प्रीत कैसी,ऐसौ रीत प्रीत पिय हमे देती ना सुहाय।
आप ना अपनाई छाडी भी नाही,रही अधर बीच हमे दीन्ही लटकाय।
बोये बीज प्रेम के फल पायौ बिरहा,नाही प्रेम बिटप फल प्रेम को आय।
बीती उमर सारी सूनी जाय बीती,ताई करिकै बहानौ"प्यारी" रमण बुलाय।
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