ब्रज सेवा
ब्रज सैवा
राखिहौ ब्रज मोहै सेवा मे।
शीश रज धरिहै,मांग सजाय लू।
रज सेवा करिके,जनम बनाय लू।
पीवू जमुना जल,रज ही पावू।
साँझ सवेरे ही,रज भोज पावू।
लोटि लोटि रेती,अंग लगाय लू।
रोम रोम ही,रज कौ बसाय लू।
चरण धरै जहाँ,पिय प्यारी डौले।
उहा ही लौटि के,प्राण गमाय दू।
पाछे मरण कौ,धूरि बन मिलिहौ।
एही रज मा ही,अंग धूरि मिलाय दू।
संत रसिक जहा,पाहुन बिन डोले।
राधा ही राधा,आठो याम बोले।
ऐसी रज मा ही,रज बन जावू।
जै हि बिनती,प्यारी चरण लिपटावू।
Comments
Post a Comment