निर्गुण कौन

निरगुण कौन
ऊधौ! निरगुण कौन सो माधौ।
जिन जानै हम तिन गुण कहतौ,मिलै कागज नाही स्याही।
कौन सौ निरगुण माधौ का रै,तैनै हमहु संदेसौ सुनाही।
कौन कौ बात बतावै रै हमकौ,जाकौ पग जिव्हा नाही नैन।
अरे! हम माधौ इन हाथ सजायै,धरायै अंजन सुनै मुख सौ बैन।
हमरै माधौ सु सुगढ साँवरौ,तुव कहतौ बिनु शरीरा।
वा कौ बिनु हमहौ हमहौ बिनु वाकौ,हिय जरत होत है पीरा।
हमहु पडै जानि तुव भूल करिहौ,कोऊ ओर को पतियाँ बाँचै।
माधौ हमरौ गुणखान रै बौरे,तौ सौ बैन प्यारी कहे साँचै।

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